बुधवार, 1 दिसंबर 2010

मारीना त्स्वेतायेवा की कविताएं

तारों और गुलाबों की तरह

तारों और गुलाबों की तरह
बड़ी होती जाती हैं कविताए
सौदर्य की तरह वे होती है अवांछनीय.

मुकुटों और प्रशस्तियों के बारे में
एक ही उत्तर है मेरे पास
कि वे मुझे क्योंकर मिलेंगे ?

सोए होते है हम जब
अंगीठी के पास से
प्रकट होता है चार पंखुरियों वाला दिव्य अतिथि.

ओ मेरी दुनिया, समझने की कोशिश कर !
सपनों में अनावृत किए हैं गायक ने
तारों के नियम और सूत्र फूलों के.
......

- "आएंगे दिन कविताओं के" से साभार -
मूल रूसी से चयन एवं अनुवाद बरयाम सिंह

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

दुष्यंत कुमार की गज़ल

ये सच है कि पांवो ने बहुत कष्ट उठाए

ये सच है कि पांवो ने बहुत कष्ट उठाए ,
पर पांव किसी तरह से राहों पे तो आए.

हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए.

जैसे किसी बच्चे को खिलौने न मिले हों,
फ़िरता हूं कई यादों को सीने से लगाए.

चट्टानों से पांवो को बचाकर नहीं चलते,
सहमे हुए पांवो से लिपट जाते हैं साए.

यों पहले भी अपना सा यहां कुछ तो नहीं था,
अब और नजारें हमे लगते है पराए.

दुष्यंत कुमार की गज़ल
-"साए में धूप" से साभार-

बुधवार, 17 नवंबर 2010

बलराज कोमल की उर्दू कविताएं

अनजानी गलियों के पत्थर

उसके पास
रूसवाई के रंगों वाले
दूर-दूर के शहरों की
खबरों वाले
ढेरों खत आया करते
आसमान नीला था
सूरज सुर्ख सुनहरा
नदी का पानी
ख्वाबों की बाते करता
आज अचानक
पिछले पहर आंख खुल गई थी उसकी
और उसे याद आया था
उसके नाम
एक जमाना बीत गया
सरगोशी के जादूवाला कोई खत
नहीं आया
वुह खुद भी
घर की दीवारों में बैठा
दिल की धड़कन सुनता था
अनजानी गलियों के पत्थर गिनता था।
.......

बलराज कोमल की उर्दू कविताएं
-"परिंदो भरा आसमान" से साभार -

साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत उर्दू कविताएं
परिंदो भरा आसमान
कवि एव लिप्यंतरकार
बलराज कोमल

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

अमृता प्रीतम की नज़्में

१.

आज एक रात --

आज एक रात --
सूरज को ढूंढने चली है
और मैं अकेली
एक दुआ बन कर
इस राह पर खड़ी हूं
.......

२.

जब हर सितारा --

जब हर सितारा --
हर गर्दिश से गुज़र कर
तेरे सूरज के पास आने लगे
तो समझना
यह मेरी जुस्तजु है
जो हर सितारे में नुमायां हो रही...

-"सातवीं किरण" से साभार-
.......

रविवार, 7 नवंबर 2010

दुष्यंत कुमार की गज़ल

"इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है"

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है.
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एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों,
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है.
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एक खंडहर के ह्रदय सी एक जंगली फ़ूल सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है.
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एक चादर सांझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है.
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निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है.
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दुख न ही कोई कि अब उपल्ब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश सी छाती तो है.

-"साए में धूप" से साभार-