ये सच है कि पांवो ने बहुत कष्ट उठाए
ये सच है कि पांवो ने बहुत कष्ट उठाए ,
पर पांव किसी तरह से राहों पे तो आए.
हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए.
जैसे किसी बच्चे को खिलौने न मिले हों,
फ़िरता हूं कई यादों को सीने से लगाए.
चट्टानों से पांवो को बचाकर नहीं चलते,
सहमे हुए पांवो से लिपट जाते हैं साए.
यों पहले भी अपना सा यहां कुछ तो नहीं था,
अब और नजारें हमे लगते है पराए.
दुष्यंत कुमार की गज़ल
-"साए में धूप" से साभार-
ये सच है कि पांवो ने बहुत कष्ट उठाए ,
पर पांव किसी तरह से राहों पे तो आए.
हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए.
जैसे किसी बच्चे को खिलौने न मिले हों,
फ़िरता हूं कई यादों को सीने से लगाए.
चट्टानों से पांवो को बचाकर नहीं चलते,
सहमे हुए पांवो से लिपट जाते हैं साए.
यों पहले भी अपना सा यहां कुछ तो नहीं था,
अब और नजारें हमे लगते है पराए.
दुष्यंत कुमार की गज़ल
-"साए में धूप" से साभार-
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें