गुरुवार, 25 नवंबर 2010

दुष्यंत कुमार की गज़ल

ये सच है कि पांवो ने बहुत कष्ट उठाए

ये सच है कि पांवो ने बहुत कष्ट उठाए ,
पर पांव किसी तरह से राहों पे तो आए.

हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए.

जैसे किसी बच्चे को खिलौने न मिले हों,
फ़िरता हूं कई यादों को सीने से लगाए.

चट्टानों से पांवो को बचाकर नहीं चलते,
सहमे हुए पांवो से लिपट जाते हैं साए.

यों पहले भी अपना सा यहां कुछ तो नहीं था,
अब और नजारें हमे लगते है पराए.

दुष्यंत कुमार की गज़ल
-"साए में धूप" से साभार-

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