रविवार, 7 नवंबर 2010

दुष्यंत कुमार की गज़ल

"इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है"

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है.
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एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों,
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है.
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एक खंडहर के ह्रदय सी एक जंगली फ़ूल सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है.
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एक चादर सांझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है.
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निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है.
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दुख न ही कोई कि अब उपल्ब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश सी छाती तो है.

-"साए में धूप" से साभार-

1 टिप्पणी:

  1. दुष्यंत कुमार की गज़ल पढ़वाने के लिए आभार. ब्लागजगत में आपका स्वागत है. बधाई और शुभकामनाएं....
    सादर,
    डोरोथी.

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